आदित्य और जाल में फँसा बाज़
आयु 6–8
जब आदित्य को फ़ुटबॉल के गोल की जाली में उलझा एक छोटा बाज़ मिलता है, तो वह मुँह नहीं फेरता। वह बारिश में पूरे दो घंटे पहरा देता है, जब तक मदद आकर उसे आज़ाद नहीं कर देती।

रात के खाने से पहले आदित्य भागता हुआ मैदान में पहुँचा। उसे खोई हुई फ़ुटबॉल ढूँढनी थी। तभी पुराने गोलपोस्ट की उलझी हुई जाली में कुछ हिला। भूरे पंखों की एक झलक दिखी और एक तीखी, नन्ही-सी चीख़ सुनाई दी। वह ठिठक गया। वह तो गेंद थी ही नहीं।
वह एक छोटा-सा बाज़ था। उसका एक पंख रस्सी के फंदों में मुड़कर फँसा हुआ था। उसकी आँखों में ग़ुस्सा भी था और डर भी। आदित्य जानता था कि उसे उन नुकीले पंजों को नहीं छूना चाहिए। पर यह भी जानता था कि वह उसे अकेला छोड़कर यूँ ही नहीं जा सकता।
“मैं मदद बुलाता हूँ,” आदित्य ने धीरे से कहा। उसने गले में पड़ी छोटी-सी लाल सीटी उठाई और रास्ते की ओर तीन तेज़ सुर बजाए। उसे उम्मीद थी कि कोई, कोई भी, सुन ले।


