वीर और बोलने वाला पत्थर
आयु 6–8
जब खेल के मैदान का एक झगड़ा वीर की दो पक्की दोस्तियों को जमा देता है, तो वह “बोलने वाला पत्थर” नाम का एक खेल बनाता है, जिसमें सबको सुनने की बारी मिलती है। और वह जान जाता है कि सबसे पहले माफ़ी माँगना उसका आज तक का सबसे बहादुर और सबसे मज़बूत काम है।

तीन दिन हो गए थे। वीर ने तीन दिन से मीरा और देव से बात नहीं की थी। उस सुपरहीरो की तरह, जो अपनी ही ताक़त भूल गया हो, वह अकेला बैठा रहता। “शुरुआत तो उन्होंने की थी,” वह बुदबुदाया। फिर भी उसका पेट पत्थर जैसा भारी लग रहा था।
हर दिन चुप्पी और बढ़ती गई। मीरा उसकी तरफ़ देखती तक नहीं थी। देव अकेला ओक के पेड़ के नीचे बैठकर खाना खाता था। वीर बार-बार ख़ुद को समझाता कि नियमों के बारे में वही सही है। पर सही होना अब अच्छा नहीं लगता था। बस ठंडा-ठंडा लगता था।
उस रात वीर को खिड़की की चौखट पर एक चिकना, धूसर-सा पत्थर मिला, अंडे जैसा गोल। उसके मन में एक विचार चमका: अगर सिर्फ़ वही बोले जिसके हाथ में यह पत्थर हो, और बाक़ी सब ध्यान से सुनें, तो? उसका थका हुआ चेहरा खिल उठा।


