आध्या का कमाल का कवच
आयु 6–8
जब बेमेल मोज़ों और अनोखे पुराने स्वेटर पर हँसी उड़ती है, तब आध्या जान जाती है कि सबसे मज़बूत कवच बस अपने जैसा होना है।

हर सुबह आध्या अपने सबसे चटकीले मोज़े चुनती थी। आज एक मोज़ा कैंडी केन जैसा धारीदार था, और दूसरा लेडीबग जैसा बिंदियों वाला। पजामे के ऊपर उसने नाना जी का पुराना बड़ा-सा नारंगी-भूरा स्वेटर पहन लिया। फिर उसने अपना टिन का बिजली वाला बटन लगाया। “एकदम बढ़िया,” आध्या ने आईने में मुस्कुराते हुए धीरे से कहा।
बस स्टॉप पर आध्या ने एक चक्कर घुमाया और अपना स्वेटर केप की तरह फैलाकर दिखाया। “आज के लिए तैयार हो?” उसने अपनी छाती पर लगे बटन से पूछा, और अच्छी किस्मत के लिए उसे दो बार थपथपाया। तभी पीली, बहुत बड़ी बस गड़गड़ाती हुई आ गई। उसके दरवाज़े किसी प्यारे ड्रैगन के मुँह की तरह फुस्स करके खुल गए।
भीड़ भरे गलियारे में किसी ने खी-खी की। “बड़े अच्छे मोज़े हैं,” एक लड़के ने ताना मारते हुए कहा, अच्छे मन से नहीं। लॉकरों के पास खड़े बच्चे मुँह पर हाथ रखकर हँसने लगे। आध्या के गाल गरम हो गए, पर उसकी ठुड्डी ऊँची ही रही, गलियारे की बत्तियों जितनी ऊँची।


