आध्या की एक मील की दौड़
आयु 6–8
जब जंगल की क्रॉस-कंट्री दौड़ ने चिपचिपे कीचड़ और खोए हुए जूते से आध्या को रोकना चाहा, तो उसे अपने भीतर एक पक्की ताल मिल गई, जो उसे सीधे फ़िनिश लाइन तक ले गई।

टक, टक। आध्या ने छोटी-सी लकड़ी की सीटी को दो बार छुआ, बिल्कुल हमेशा की तरह। “अच्छी किस्मत के लिए,” उसने धीरे से कहा। चारों तरफ़ जूते घिसट रहे थे और दिल धड़क रहे थे। दौड़ शुरू करने वाला झंडा हवा में फड़फड़ा रहा था। “धावक तैयार?” नेला मैडम ने आवाज़ लगाई, जो इस मौसम में उसकी कोच थीं। आध्या की टाँगें ऐसे भनभना रही थीं, जैसे उड़ने को तैयार मधुमक्खियाँ।
धाँय! और सब दौड़ पड़े। जूते सुनहरी घास पर धम-धम करते जा रहे थे। ओजस लाल हेडबैंड के नीचे मुस्कुराता हुआ आध्या के साथ-साथ उछलता चल रहा था। “चीड़ के पेड़ों तक रेस लगाएँ?” वह हँसकर बोला। आध्या भी हँस पड़ी और उसने अपने हाथ और तेज़ चलाए। सीटी वाला लॉकेट उसकी छाती पर उछल रहा था।
रास्ता ढलकर चीड़ के अँधेरे जंगल में उतर गया। जड़ें सोए हुए साँपों की तरह मुड़ी पड़ी थीं। आध्या एक जड़ पर कूदी, फिर दूसरी पर। उसने चीड़ की ख़ुशबू को गहरी साँस में भरा। “यहाँ पैर देखकर चलना!” ओजस ने पीछे मुड़कर कहा। उसकी आवाज़ ऊँचे तनों के बीच गूँज उठी।


