दिया और मन की ढाल
आयु 6–8
जब चिढ़ाने वाली बातें चुभने लगती हैं, तो दिया दादी रोज़ा से सीखती है कि बुरी बातें न चाहे गए तोहफ़ों जैसी होती हैं, और उसे अपनी एक झिलमिलाती ढाल मिलती है, जिसे सिर्फ़ वही खोल सकती है।

छुट्टी के समय दिया ने सबको बैंगनी ड्रैगन की अपनी ड्रॉइंग दिखाई। “कितनी बेवकूफ़ी की बात है,” दीपक हँसकर बोला। “ड्रैगन कहीं बैंगनी होते हैं?” दिया के गाल गरम हो गए। ये बातें ठंडे पानी के छींटे की तरह चुभीं। उसने अपने हरे जूतों की ओर देखा और सोचा, काश वह कहीं गायब हो जाए।
उस रात खाने की मेज़ पर दिया चुपचाप बैठी रही और अपने मटर कुरेदती रही। “आज स्कूल में कुछ हुआ था,” उसने धीरे से कहा। उसके गले में चाँदी का लॉकेट था, छोटी-सी ढाल के आकार का। आज वह बहुत भारी लग रहा था। क्या कोई समझेगा कि उन बातों ने उसे कितना दुख पहुँचाया?
अगले दिन दोपहर में दादी रोज़ा बरामदे के झूले पर बैठी थीं, हाथ में चाय का प्याला था। दिया ने उन्हें सब कुछ बता दिया। “मेरी प्यारी बच्ची,” दादी रोज़ा बोलीं, “बुरी बातें तोहफ़ों जैसी होती हैं। कोई तुम्हें देता है, पर तुम्हें लेना ज़रूरी नहीं। अगर तुम कह दो, ‘नहीं, शुक्रिया,’ तो वह तोहफ़ा देने वाले के पास ही रह जाता है।”


