सान्वी और स्केटपार्क की पहली लड़की
आयु 6–8
सान्वी मोहल्ले के स्केट बाउल में अकेली ऐसी बच्चा है जो लड़का नहीं है, और रोज़ घूरती नज़रें उसे दीवार जैसी लगती हैं, जब तक कि वह गहरे कटोरे में उतरकर एक साफ़ किकटर्न नहीं लगा लेती और उस दीवार को हर उस लड़की के लिए तोड़ देती है जो उसके बाद आएगी।

हर शनिवार सान्वी अपने पीले स्केटबोर्ड पर सवार होकर पार्क के पीछे वाले कंक्रीट के कटोरे तक जाती थी। हर शनिवार वहाँ वही अकेली थी जो लड़का नहीं थी। आज उसके स्नीकर्स कुरकुर करते हुए बाड़ के पास आकर रुके, और उसने गिना कि ग्यारह सिर उसे देखने के लिए मुड़ गए।
“ये कटोरा असली स्केटर्स के लिए है,” एक लड़का बुदबुदाया, इतनी धीमी आवाज़ में कि पक्का न हो कि सान्वी ने सुना या नहीं। उसने सुन लिया था। उसके गाल गरम हो गए, फिर भी वह गेट से अंदर चली गई। कंक्रीट पर उसके बूटों की खट-खट गूँज रही थी और दिल रस्सी कूदने की तरह धक-धक कर रहा था।
सान्वी ने अपना बोर्ड किनारे पर रखा और कटोरे के अंदर झाँका। वह गहरा और चिकना था, किसी बड़े पत्थर के चम्मच जैसा। उसके पेट में गुड़गुड़ हुई। उसने अपने घर के आँगन में किकटर्न की सौ बार प्रैक्टिस की थी, पर इतनी बड़ी जगह पर कभी नहीं।


