दिया और हाई-फ़ाइव का नियम
आयु 6–8
परिवार की एक बड़ी, चहल-पहल भरी दावत में दिया को एक ऐसी ताक़त मिलती है जो सामने ही छिपी थी: एक साफ़, दोस्ताना आवाज़ जो उसके शरीर को उसका अपना बनाए रखती है।

परिवार का मिलन-समारोह सबसे मज़ेदार शोर से भरा था: नींबू-पानी में बुलबुले उठ रहे थे, लालटेनें झूल रही थीं, और चचेरे-ममेरे भाई-बहन गुलबहार के फूलों के बीच मधुमक्खियों के पीछे दौड़ रहे थे। “याद रखना,” ने दिया को आँख मारकर कहा, “तुम्हारे शरीर का फ़ैसला हमेशा तुम ही करोगी।” दिया ने सिर हिलाया, अपना सितारे वाला पिन ठीक किया और खेलने दौड़ गई।
“अरे, मेरी सबसे प्यारी छोटी धूप आ गई!” बलदेव चाचा ज़ोर से बोले। उन्होंने नींबू-पानी का जग रखा और बड़ी-सी झप्पी के लिए दोनों बाँहें फैला दीं। दिया एक छोटा क़दम पीछे हट गई। अचानक मिलने वाली बड़ी झप्पियाँ उसे कभी ठीक नहीं लगती थीं।
दिया को सुबह की की बात याद आई: “तुम्हारा शरीर तुम्हारा है, इसका फ़ैसला तुम करोगी।” उसने अपने सितारे वाले पिन को दो बार थपथपाया, गहरी साँस ली और अपनी साफ़, दोस्ताना आवाज़ ढूँढ ली, जो चिल्लाती नहीं थी, पर काँपती भी नहीं थी।


