पीहू की घर लौटने की राह
आयु 6–8
जब गिरे हुए पेड़ ने रास्ते के निशान छिपा दिए और पहाड़ पर कोहरा छा गया, तब पीहू ने अपने नक्शे, अपनी सीटी और अपने शांत मन पर भरोसा करके परिवार को सुरक्षित नीचे पहुँचाया।

पीहू को अपने परिवार के साथ पहाड़ों पर पैदल चलना बहुत पसंद था, और सबसे ज़्यादा तब, जब नक्शा देखने की बारी उसकी होती। आज का रास्ता चीड़ के पहाड़ पर चढ़ता हुआ एक पथरीली चोटी तक जाता था। “निशानों के पास ही रहना,” आगे चल रहे दादाजी रघुनाथ ने आवाज़ लगाई। उनकी छड़ी पीले रंग वाले एक खंभे पर ठक-ठक बजी। पीहू ने सिर हिलाया और अपनी जैकेट की जेब में रखे नक्शे को थपथपाया।
वे ऊपर और ऊपर चढ़ते गए। चीड़ के फलों को सूँघता और अपनी पूँछ हिलाता रहा। दादाजी रघुनाथ की सीटी की धुन चट्टानों से टकराकर गूँज रही थी। तभी — चटाक! — चीड़ का एक विशाल पेड़ टूटकर ठीक रास्ते के आर-पार गिरा पड़ा था। उसकी जड़ें ज़मीन से उखड़ गई थीं। अगला पीला खंभा कहीं दिखाई नहीं दे रहा था।
वे तने के ऊपर से चढ़कर आगे बढ़ गए, पर रास्ता किधर था? बाईं ओर बड़े पत्थरों की तरफ़, या दाईं ओर पेड़ों की तरफ़? अब किसी को पक्का पता नहीं था। पीहू के पेट में गुदगुदी-सी होने लगी, और के कान भी लटक गए।


