मायरा और रोज़ के हीरो की तलाश
आयु 6–8
पड़ोस के एक व्यस्त दिन में मायरा सच्चे हीरो का राज़ ढूँढने निकलती है, और पाती है कि वह तो हमेशा से उसके अपने अंदर ही था।

मायरा को सुपरहीरो बहुत पसंद थे—केप, ताक़तें, उनकी पूरी चमकती-दमकती दुनिया। एक सुहानी शनिवार की सुबह उसने पूछा, “मिलो, सच में किसी को हीरो क्या बनाता है?” मिलो ने कंधे उचकाए। “पता नहीं। चलो, पता लगाते हैं।” मायरा ने अपनी नोटबुक उठा ली। उसने तय किया कि आज हीरो की खोज होगी। पर शुरू कहाँ से करें?
कोने वाले बाज़ार की पार्किंग में एक पुरानी ट्रॉली टेढ़ी पड़ी थी। कोट पहने एक औरत ने अपनी ट्रॉली वहीं छोड़ी नहीं, बल्कि सलीक़े से उसकी जगह पर लौटा दी। “यही तो है! ये ज़रूर कोई छुपी रुस्तम होंगी, अमीर या मशहूर!” मायरा बोली। मिलो हँस पड़ा। “या शायद वो बस... अच्छी हैं?” मायरा को यक़ीन नहीं हुआ। क्या बात सच में इतनी आसान हो सकती है?
“शायद हीरो के पास ऐसी ताक़तें होती हैं जो हमें दिखती नहीं,” मायरा फुसफुसाई और मिलो के साथ अपार्टमेंट की लॉबी में आ गई। तभी एक आदमी का हाथ आगे बढ़ा और उसने डगमगाते लिफ़्ट के दरवाज़े को थाम लिया, ताकि एक बड़ा-सा डिब्बा उठाए लड़का अंदर जा सके। “वाह,” मायरा के मुँह से निकला। “क्या ये कोई जादुई ताक़त थी?” “अरे नहीं,” मिलो बोला। “बस सही वक़्त पर हाथ बढ़ा दिया।”


