वीर और जीवाश्म जोड़ने वाली मशीन
आयु 6–8
जब संग्रहालय में प्राचीन हड्डियों का एक रहस्यमयी ढेर आता है, तो सात साल के वॉलंटियर वीर को उन्हें स्कैन करना, अंदाज़ा लगाना और एक रैप्टर का कंकाल हड्डी-दर-हड्डी जोड़ना पड़ता है, ताकि वह जान सके कि यह जीव कभी दो टाँगों पर शान से कैसे खड़ा होता था।

हर शनिवार वीर अपनी हरी-नीली वॉलंटियर जैकेट पहनता और विशाल व्हेल की खोपड़ी के पास से भागता हुआ जीवाश्म प्रयोगशाला पहुँच जाता। आज का दिन ख़ास था। रेगिस्तान की खुदाई से रहस्यमयी हड्डियों का एक बक्सा अभी-अभी आया था। "पहेली सुलझाने के लिए तैयार हो, वीर?" डॉक्टर कुमुद ने बक्सा अंदर लाते हुए पूछा। वीर के बैज की पिन चमक रही थी। "हमेशा तैयार!" वह मुस्कुराकर बोला।
बक्से में ढेर सारी उलझी हुई हड्डियाँ थीं। कुछ चम्मच जितनी छोटी थीं, तो कुछ वीर की बाँह जितनी लंबी। एक भी हड्डी किताबों के किसी डायनासोर जैसी नहीं लग रही थी। "इस जीव के बारे में कोई नहीं जानता," डॉक्टर कुमुद ने कहा। बोल्ट बीप-बीप करता हुआ पास आया। उसकी स्कैनर वाली बाँह घूम रही थी और वह वीर के चेहरे से दूर ही रहा। "अनजानी प्रजाति मिली!" वह चहका। वीर की आँखें हैरानी से फैल गईं।
"हड्डियाँ आपस में कैसे जुड़ती थीं, यह अंदाज़ा लगाने से पहले हर हड्डी की सही बनावट जाननी होगी," डॉक्टर कुमुद ने समझाया। वीर ने हरी-नीली जैकेट और गले में लैनयार्ड पहने हुए अपना चाँदी जैसा स्कैनर उठाया और उसकी चमकती नोक एक मुड़ी हुई जाँघ की हड्डी की ओर की। हल्की नीली रोशनी हड्डी पर फिरी और प्रयोगशाला की स्क्रीन पर उसकी चमचमाती 3D प्रतिकृति उभर आई। वीर ने ऊपर देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "वाह! यह तो जैसे


