विवान और सौ त्रिभुजों वाला पुल
आयु 6–8
जब विवान कस्बे की बाल्सा-लकड़ी के पुल की प्रतियोगिता में हिस्सा लेता है, तो उसे त्रिभुज, तनाव और दबाव को समझना पड़ता है, ताकि वह ऐसा पुल बना सके जो मज़बूती परीक्षा के दिन सब प्रतिद्वंद्वियों से ज़्यादा टिके।

ट्रेसलविक कस्बे में हर पतझड़ में छोटे-बड़े सभी कारीगर पुल की मज़बूती की बड़ी प्रतियोगिता के लिए इकट्ठा होते थे। विवान अपनी सरसों-पीली बंडी और मोड़े हुए डेनिम ओवरऑल में कार्यशाला के बाड़े के दरवाज़े पर लगा प्रतियोगिता का पोस्टर देख रहा था। “ऐसा पुल जो अपने वज़न से सौ गुना वज़न उठा ले,” वह धीरे से बोला। “यही मेरा सपना है।” उसके पास खड़ी मीता मुस्कुराई। “तो चलो विवान, इस सपने को बनाते हैं!”
कार्यशाला के बाड़े के अंदर प्रोफ़ेसर चीकू उड़कर एक शहतीर पर आ बैठे। उनका चश्मा चमक रहा था। “मज़बूत पुल बस कुछ समझदार त्रिभुजों से बनता है, जो एक-दूसरे का हाथ थामे रहते हैं,” उन्होंने कहा। “चौकोर ढाँचे हिलते हैं। त्रिभुज कभी नहीं हिलते।” विवान की बंडी पर बुरादा लगा था। उसने सिर टेढ़ा करके कहा, “मुझे दिखाइए।” और उसने मुट्ठी भर बाल्सा की तीलियाँ उठा लीं।
विवान ने चार तीलियों से एक चौकोर बनाया और हल्के से धक्का दिया। वह किसी ऊँघते दैत्य की तरह एक तरफ़ झुक गया। फिर उसने तीन तीलियों से त्रिभुज बनाया और उतने ही ज़ोर से धक्का दिया। वह ज़रा भी नहीं हिला। “त्रिभुज कभी नहीं हिलते!” वह हँस पड़ा, उसकी आँखें हैरानी से फैल गईं। प्रोफ़ेसर चीकू ने सिर हिलाया। “बिल्कुल ठीक।”


