रोहन और चाँद की गुलेल

आयु 6–8

रोहन को एक सटीक कोण ढूँढना है, ताकि सिर्फ़ गुरुत्वाकर्षण और रोशनी की मदद से नकली यान के फँसे हुए दल को पृथ्वी तक सुरक्षित पहुँचाया जा सके।

"रोहन और चाँद की गुलेल" का कवर

“मिशन की घड़ी चल रही है, रोहन!” मीरा ने घंटी जैसी आवाज़ में कहा और उसके पंख खट-खट करके खुल गए। काँच के गुंबद पर एक नन्हा नकली यान लाल रोशनी में टिमटिमा रहा था। वह चाँद से बहुत आगे अटक गया था। “ईंधन शून्य है,” कैप्टन रमेश ने स्पीकर पर कहा। “ईंधन शून्य, उम्मीद भी शून्य... जब तक कोई घर लौटने का दूसरा रास्ता न ढूँढ ले।”

रोहन रॉकेट की नोक जैसी बीन-बैग वाली सीट पर बैठ गया और अपनी छाती के पास पीतल का ग्रहमंडल वाला कंपास कसकर पकड़ लिया। “ईंधन नहीं है, तो इंजन भी नहीं चलेंगे,” उसने धीरे से कहा और कंपास खोल दिया। अंदर नन्हे-नन्हे ग्रह घूम रहे थे। “पर गुरुत्वाकर्षण कभी खत्म नहीं होता।” मीरा के छल्ले दो बार टिमटिमाए। “बिलकुल सही! चाँद का खिंचाव यान को घर की ओर उछाल सकता है, बस कोण ठीक वही होना चाहिए।”

कंसोल के ऊपर एक आसमानी चाप चमक उठा। “कोण बहुत कम हुआ,” मीरा बोली, “तो यान चाँद के पास से फिसलकर गहरे अंतरिक्ष में हमेशा के लिए खो जाएगा।” “कोण बहुत ज़्यादा हुआ,” कैप्टन रमेश की आवाज़ चरमराई, “तो यान सीधे चाँद की सतह से टकरा जाएगा।” रोहन रोशनी में चमकते चेहरे के साथ आगे झुक गया। “तो मुझे इन दोनों के बीच का कोण चाहिए। एकदम सही कोण।”

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