ईशान और घड़ी-कल वाली वेधशाला
आयु 6–8
जब उल्कापात की ख़ास रात पर पुरानी वेधशाला की तारों का पीछा करने वाली घड़ी-मशीन रुक जाती है, तो ईशान को दाँत-दाँत गिनकर सही गियर चुनना है और आसमानी नज़ारा हाथ से निकलने से पहले मशीन ठीक करनी है।

हर मंगलवार की रात ईशान सौ गोल-गोल सीढ़ियाँ चढ़कर वेधशाला के गुंबद तक जाता था, जहाँ डॉ. नीला हर्गोव तारों की निगरानी करती थीं। “टिकर तब से तारे गिनने में मेरी मदद करता आया है, जब मैं तुम्हारे जितनी छोटी थी,” वे हमेशा कहतीं। आज की रात ख़ास थी। उल्कापात होने वाला था, और बड़ी दूरबीन को आसमान का पीछा अपने आप करना था, टिक, टिक, टिक।
“इस छोटे पहिये को एस्केपमेंट कहते हैं,” डॉ. नीला ने कहा। उनका हाथ अंदर बढ़ा और मशीन के भीतर एक छोटे टिक-टिक करते पहिये की ओर इशारा किया। “यह गियरों को छोटी-छोटी, बराबर खटकों में घुमाता है, इसीलिए दूरबीन तारों के पीछे बिना एक भी झटके के सरकती है।” टिकर ख़ुशी से घर्र-घर्र करने लगा। “टिक, टिक, टिक!” वह गाने लगा और हर खटके को ज़ोर से गिनने लगा।
अचानक मशीन के अंदर गहराई में कुछ उदास-सी खट की आवाज़ हुई और सब रुक गया। दूरबीन घूमते-घूमते थम गई, और उसका मुँह ख़ाली आसमान की ओर रह गया। “अरे नहीं,” डॉ. नीला बोलीं। “बड़े ड्राइव गियर के दाँत घिस गए हैं। नया गियर नहीं मिला तो पूरा उल्कापात निकल जाएगा!”


