वीर और केबल क्लाइंबर कप
आयु 6–8
जब वीर का लेज़र से चलने वाला चढ़ने वाला रोबोट मुक़ाबले के चिकने चाँदी जैसे रिबन ट्रैक पर बार-बार फिसलता है, तो उसे घर्षण को ही मात देने की तरकीब सोचनी पड़ती है, ताकि वह केबल क्लाइंबर कप की चोटी तक पहुँच सके।

केबल क्लाइंबर कप में बीप-बीप करते रोबोटों और घबराई हुई मुस्कानों की धूम थी। वीर एक छोटे रेंगने वाले रोबोट के पास घुटनों के बल बैठा था। उसके पहिये चिपकने वाली धारियों वाले थे। वीर ने उसके नीले चमकते सेंसर-बिंदु को एक बार फिर जाँचा। “पकड़ो और चलो, बिंदी — पकड़ो और चलो!” उसने धीरे से कहा। बिंदी की पीली आँखें दो बार झपकीं। हॉल के दूसरे छोर पर कहीं भोंपू बजा। चढ़ाई शुरू होने वाली थी!
“तैयार हो, वीर?” ने अगले स्टेशन से आवाज़ लगाई। वह अपना चश्मा ठीक कर रही थी। “मेरे क्लाइंबर में नए ग्रिप पैड लगे हैं।” वीर मुस्कुराया। “मेरा तो लेज़र की ताक़त से चलता है — बैटरी की ज़रूरत ही नहीं!” ने हैरानी से भौंह उठाई। वीर ने अपना चाँदी जैसा विज़र हेयरबैंड में लगाया। उसने उसे आँखों के ऊपर ही रखा, ताकि किरण का निशाना साध सके।
एक जज ने रिबन ट्रैक को शुरुआती लाइन के पास सीधा लिटा दिया, ताकि हर रोबोट ठीक से रखा जा सके। वीर ने छोटे रोबोट को नीचे के किनारे पर रखा। उसके पहिये रिबन से सटे थे — चिकना चाँदी जैसा रिबन, बर्फ़ की तरह फिसलन भरा। “जब मैं कहूँ ‘चलो’, तब सीधे ऊपर चढ़ना,” उसने धीरे से कहा। बिंदी ने घबराई-सी एक छोटी धुन बजाई।


