अनन्या और चमकती सर्पिल स्ट्रीटलाइट
आयु 6–8
अनन्या ठान लेती है कि अपने मोहल्ले को बिजली की एक बूँद बर्बाद किए बिना रोशन करेगी। वह समुद्र किनारे के एक शोध-दल के साथ मिलकर चमकने वाले सूक्ष्म जीव इकट्ठा करती है और एक सर्पिल स्ट्रीटलाइट बनाती है, जो शाम की हवा से हिलते ही नीली रोशनी में चमक उठती है।

हर रात अनन्या के मोड़ वाली स्ट्रीटलाइट भिनभिनाती और जलती रहती, और सब सोए होते तब भी ढेर सारी बिजली पी जाती। "अँधेरे को रोशन करने का कोई बेहतर तरीका ज़रूर होगा," उसने कहा और अपना पीतल का आतिशी शीशा ठुड्डी पर थपथपाया। उसे पता ही नहीं था कि जवाब रेत के दाने से भी छोटा है — और नीले रंग में चमकता है।
"अगर रोशनी को बिजली की ज़रूरत ही न पड़े तो?" अनन्या ने ज़ोर से सोचा। वह समुद्र में चमकने वाले जीवों की किताब के पन्ने पलट रही थी। तभी मेज़ पर रखा स्पीकर खरखराकर चालू हो गया। "बिल्कुल सही समय पर," एक मीठी आवाज़ आई — समुद्र के किनारे बहुत दूर बने एक शोध-एक्वेरियम से डॉ. सुमन बोल रही थीं। "कुछ ऐसा देखना चाहोगी जो चमकता है?"
स्पीकर पर डॉ. सुमन अनन्या को समझाती गईं। स्क्रीन पर दस्ताने पहने हाथ एक छोटी-सी सैंपलर भुजा को बड़े से टैंक में घुमा रहे थे। भुजा ने मूँगे के पास से चमकते पानी की एक पतली-सी धार धीरे से खींची। "ये नन्हे जीव अपनी रोशनी खुद बनाते हैं," डॉ. सुमन ने कहा। "इसे बायोल्यूमिनेसेंस कहते हैं। ठंडी रोशनी — इसमें लगभग ज़रा भी गर्मी नहीं होती!"


