सिया का रोबोट ड्रोन, जो फूलों में पराग भरता है

आयु 6–8

जब अचानक पड़ी ठंड से बाग़ की मधुमक्खियाँ छत्ते में ही फँस जाती हैं, तो सिया रोएँदार पेट वाले नन्हे ड्रोनों का भिनभिनाता झुंड बनाती है, ताकि फूल झरने से पहले हर सेब के फूल में परागण हो जाए।

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हर सेब के फूल पर पाला ऐसे चमक रहा था, जैसे मिठाई पर चीनी बिखरी हो। लकड़ी के छत्ते के अंदर मधुमक्खियाँ सिकुड़ी और चुपचाप पड़ी थीं, इतनी ठंड में उनसे कहीं उड़ा ही नहीं जा रहा था। “मधुमक्खियाँ नहीं, तो इस साल सेब भी नहीं,” दादी शांता ने आह भरी, ठंड में उनकी साँस सफ़ेद भाप बनकर उड़ रही थी। सिया ने चुप पड़े छत्ते को ग़ौर से देखा, उसका जबड़ा कस गया। “तो हमें ऐसे मददगार चाहिए जिन्हें ठंड से डर न लगे,” उस

लाल रंग के औज़ारों वाले छप्पर की कार्यशाला में सिया ने गियर, तारों के लच्छे और दादी शांता के पुराने ब्रशों से निकला घोड़े के बालों का मुलायम गुच्छा फैला दिया। “मधुमक्खियाँ अपनी रोएँदार टाँगों पर पराग ले जाती हैं,” उसने धीरे से कहा और हथेली पर एक नन्ही मोटर पलटते हुए गहरी सोच में डूब गई। उसके मन में एक योजना गुनगुनाने लगी, हर गियर घुमाने के साथ और ज़ोर से। “सीधी उड़, सच्ची उड़,” वह अपने आप से गुनगु

सिया ने एक-एक बाल करके घोड़े के मुलायम बाल एक छोटे ड्रोन के गोल पेट पर चिपकाए और धीमे-धीमे अपनी नई धुन गुनगुनाती रही। “लो, अब रोएँदार और तैयार,” वह बुदबुदाई। मशीन की काँच के मोतियों जैसी आँखें झपककर जाग उठीं और उसके पंख डगमगाते हुए फड़फड़ाए। तभी सिया ने उसे अपनी खुली हथेली में सँभाल लिया और मुस्कुरा उठी।

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