आध्या और मूंगे की चट्टान का प्रिंटर
आयु 6–8
जब एक तूफ़ान प्यारी मूंगा-चट्टान को तोड़ डालता है, तो आध्या एक समुद्री वैज्ञानिक के साथ मिलकर पत्थर के नन्हे ढाँचे डिज़ाइन करती और छापती है, जो मूंगे के बच्चों को वापस अपने घर बुला लाते हैं।

आध्या नाव की रेलिंग पर झुककर खड़ी थी। कल तक लैगून इंद्रधनुषी बगीचे की तरह जगमगा रहा था। आज टूटे हुए मूंगे टूटी प्लेटों की तरह बिखरे पड़े थे। मीना उसके पास खड़ी थीं, एक हाथ रेलिंग पर रखे। वे धीरे से बोलीं, “पकड़ने के लिए कुछ न हो, तो नए मूंगे दोबारा उग नहीं पाते।” आध्या ने रेलिंग को कसकर पकड़ लिया। “तो चलिए, हम उन्हें पकड़ने के लिए कुछ बना देते हैं।”
नाव की छोटी-सी लैब में मीना ने मूंगों की आकृतियों वाला चार्ट खोला। वे बोलीं, “मूंगे के बच्चों को पॉलिप कहते हैं। ये बड़े नखरीले होते हैं।” आध्या ने पहले एक चिकना कंकड़ छुआ, फिर एक खुरदुरी सीपी। खुरदुरी सीपी उसकी उंगलियों को ज़्यादा अच्छी लगी। “मुझे लगता है, उन्हें उबड़-खाबड़ चीज़ें सबसे ज़्यादा पसंद आएँगी,” उसने अंदाज़ा लगाया। मीना मुस्कुराईं। “चलो, आज़माकर देखते हैं।”
मीना एक अजीब-सी मशीन को धकेलकर ले आईं। “यह कैल्शियम कार्बोनेट की स्याही से छापती है,” वे बोलीं। “वही खनिज, जिससे असली मूंगे की हड्डियाँ बनती हैं।” छपाक! नीचे नाव से बुलबुले टकराए, गोलू हमेशा की तरह उत्सुक था। आध्या की आँखें फैल गईं। “मतलब पॉलिप सोचेंगे कि यह असली हड्डी है!” “बिल्कुल,” मीना ने कहा। “अब इसका आकार बनाते हैं।”


