मायरा और बबलू उल्लू का बायोनिक पंजा

आयु 6–8

जब चोट लगने के बाद एक बचाया गया सफ़ेद उल्लू अपना संतुलन खो बैठता है, तो मायरा गियर और गोंद से भरी अपनी कार्यशाला को बायोमेडिकल इंजीनियरिंग की प्रयोगशाला बना देती है। वह अपने मन के संदेहों का सामना करते हुए बबलू के लिए बिल्कुल नया पंजा बनाती है।

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मेडोब्रुक अभयारण्य में मायरा सरसों-पीले कॉर्डरॉय के ओवरऑल और धारीदार कमीज़ में थी। वहाँ उसे बबलू नाम का खलिहान वाला उल्लू भूसे में दुबका मिला। उसकी एक टाँग पर सफ़ेद पट्टी बँधी थी। “अब यह अपनी डंडी को पकड़ नहीं पाता,” डॉक्टर मीना ने धीरे से कहा। बबलू ने अपनी बड़ी काली आँखें झपकाईं और लड़खड़ा गया। मायरा को अपने सीने में कुछ खिंचता-सा लगा। “तो मैं इसे फिर से खड़ा होने में मदद करूँगी,” उसने फुसफुसाकर

“इसकी पुरानी टाँग टेढ़ी जुड़ गई,” डॉक्टर मीना ने पट्टी पर हल्के से उँगली फिराते हुए समझाया। “इसे संभलने के लिए कोई नई चीज़ चाहिए।” मायरा ने अपना पीतल का छोटा लेंस निकाला। उसने उसे आँख से थोड़ा दूर पकड़ा, ताकि साफ़ दिखता रहे। फिर वह बबलू की सही-सलामत टाँग का एक-एक शल्क और एक-एक नस ध्यान से देखने लगी। “मुझे ठीक से देखना है कि पंजा कैसे पकड़ता है,” उसने कहा, “तभी तो मैं ऐसा पंजा बना पाऊँगी जो काम करे

उसी दोपहर मायरा कार्यशाला की छोटी कोठरी में क्लिपबोर्ड पर पंजे के नमूने बनाने लगी। “तीन उँगलियाँ, बिल्कुल बबलू जैसी,” वह बुदबुदाई। वह मिटाती और फिर से बनाती। “और यह अकड़कर नहीं बैठ सकता, इसे मुड़ना भी होगा!” अगर वह गलत हो गई तो? खिड़की के बाहर पिंजरे से बबलू देख रहा था। पेंसिल की हर खरखर पर उसका सिर टेढ़ा हो जाता, जैसे पूछ रहा हो, पक्का है ना?

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