मायरा के कोहरे के जाल और प्यासे पेड़

आयु 6–8

जब मायरा के परिवार का पहाड़ी बाग़ सूखा और धूल से भर जाता है, तो वह एक अनुभवी पड़ोसन के साथ मिलकर धुंध वाली पहाड़ी पर जाली के जाल लगाती है और पेड़ों के लिए कोहरे की नन्ही बूँदें पकड़ती है, बूँद-बूँद करके।

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मायरा के बाग़ के फलों वाले पेड़ थकी हुई छतरियों की तरह झुके हुए थे। हफ़्तों से बारिश नहीं हुई थी। “हमारी पानी की टंकी लगभग ख़ाली हो गई है,” बरामदे से उसकी दादी ने आवाज़ लगाई। “बूँद-बूँद करके हम कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेंगे,” मायरा ने कहा। उसने अपनी धूप वाली टोपी नीचे खींची और धुंध से ढकी पहाड़ी की ओर चल पड़ी।

पहाड़ी की चोटी पर मायरा ने शांता को दो लकड़ी के खंभों के बीच एक ऊँचा जाल बाँधते देखा। “हर सुबह कोहरा ऊन जैसा घना छा जाता है,” शांता ने अपने खुरदुरे हाथ से जाली को सहलाते हुए कहा। “बूँद-बूँद करके मैं बरसों से उसका पानी पकड़ती आई हूँ। पास आओ, मैं दिखाती हूँ कैसे।”

“कोहरा बारिश नहीं होता,” शांता ने समझाया। “ये हवा में तैरती पानी की नन्ही बूँदें होती हैं, इतनी हल्की कि नीचे गिर ही नहीं पातीं। जब ये हवा के साथ उड़ती हुई आती हैं, तो जाल इन्हें पकड़ लेता है।” मायरा ने अपना आतिशी शीशा जाली से लगाया और हर धागे पर चिपकी चाँदी जैसी बूँदें देखकर हैरान रह गई।

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