ईरा और क़दमों से जलने वाला फ़र्श
आयु 6–8
जब स्कूल की लाइब्रेरी की बत्तियाँ बुझ जाती हैं, तो ईरा को पता चलता है कि गलियारे में दौड़ते हर क़दम में छिपी हुई ऊर्जा है, जिसे बस पकड़ने की देर है।

लाइब्रेरी की बत्तियाँ एक बार टिमटिमाईं, दो बार टिमटिमाईं, और फिर बुझ गईं। “फिर से!” ईरा ने कराहकर कहा। उसने बिजली के निशान वाला नीला ज़िप वाला हुडी पहन रखा था। वह अँधेरे रीडिंग कॉर्नर को देखती रह गई। हर दोपहर बच्चे यहाँ किताबें लेकर आराम से बैठते थे, लेकिन रोशनी के बिना यह प्यारा-सा कोना उदास और फीका लग रहा था। “इसे ठीक करने का कोई तो तरीका होगा,” वह अपना क्लिपबोर्ड कसकर पकड़े हुए धीरे से बोली।
“तारें तो ठीक हैं,” अलोंज़ो अंकल ने रिंच से दीवार को थपथपाते हुए कहा। काम करते हुए उनका चेहरा आधा दूसरी तरफ़ मुड़ा हुआ था। “दिक्कत यह है कि इस पुरानी इमारत में सब चीज़ों के लिए काफ़ी बिजली बनती ही नहीं।” गलियारे की रोशनी में ईरा का नीला हुडी चमक रहा था। वह सोच में पड़ी थी कि तभी बच्चे धम-धम करते दौड़ते हुए पास से गुज़रे। “रुकिए,” वह धीरे से बोली। “अगर यही हमारी मदद कर दे तो?”
उस रात ईरा अपने कमरे के फ़र्श पर लेटी हुई थी। उसके पास ऊर्जा के बारे में लाइब्रेरी की किताबें थीं, और वह अब भी अपना नीला हुडी पहने थी। एक पन्ने पर आकर उसकी नज़र ठहर गई। उसमें ऐसे क्रिस्टलों के बारे में लिखा था जो दबाने पर बिजली बनाते हैं। “पीज़ोइलेक्ट्रिक,” उसने उँगली से शब्द को छूते हुए ज़ोर से पढ़ा। “दबाव से बिजली बनती है। और क़दमों से भी दबाव पड़ता है! दबाओ और चिंगारी निकालो!”


