कबीर और कुरकुरे रंगों वाला बगीचा
आयु 3–5
जब कबीर को लगता है कि सब्ज़ियाँ बहुत फीकी होती हैं, तो बगीचे का एक जादुई नज़ारा उसे दिखाता है कि रंगों को कुरकुर करके खाने से उसमें कूदने, दौड़ने और ताकतवर बनने की ऊर्जा आती है।

कबीर ने अपनी थाली को देखा। “बस हरा और नारंगी?” उसने आह भरी। थाली कितनी शांत लग रही थी। कितनी स्थिर। कबीर को तो ऐसे रंग चाहिए थे जो नाचें और कुरकुरे भी हों!
अचानक बगीचे का फाटक चरर-चरर करके खुल गया। सुनहरी रोशनी क्यारी के चारों ओर घूमने लगी। कबीर ने अपना बड़ा-सा लेंस उठा लिया। रंगों की खोज का समय आ गया था!
सबसे पहले उसे गाजर मिली, गर्मी के सूरज जैसी चमकदार। “कुर्र-कुर्र!” आवाज़ आई। जैसे नारंगी रंग के किसी छिपे हुए खज़ाने को कुतर रहा हो। कबीर खिलखिला उठा।


