अर्जुन और डूबे हुए कम्पास का राज़
आयु 6–8
जब अर्जुन को झील के किनारे एक रहस्यमयी, अटका हुआ कम्पास मिलता है, तो उसे बहुत पहले के एक खोजी की छोड़ी हुई पहेलियाँ सुलझानी होती हैं, ताकि सूरज ढलने से पहले वह छिपा हुआ खज़ाने का डिब्बा ढूँढ ले।

अर्जुन झील के किनारे घुटनों के बल बैठा था। दो चपटे पत्थरों के बीच कुछ चमक रहा था। उसने हाथ बढ़ाकर एक भारी, गोल चीज़ बाहर निकाली। वह पीतल का कम्पास था, पर उसकी सुई अटकी हुई थी और धीरे-धीरे अजीब-से चक्कर काट रही थी। “नमस्ते,” अर्जुन ने धीरे से कहा। “तुम कौन-सा राज़ छिपाए बैठे हो?”
झबरू गिलहरी चीड़ के पेड़ से फुदकती हुई नीचे आई और कम्पास को देखकर चीं-चीं करने लगी। तभी सुई अचानक रुक गई। वह सीधे एक बड़ी, धूसर चट्टान की ओर इशारा कर रही थी, जिस पर सफ़ेद रंग से एक तारा बना था। अर्जुन ने अपनी डायरी देखी। यह तो रास्ते का निशान था! “तुम चाहते हो कि मैं इस तारे के पीछे-पीछे चलूँ, है ना?” उसने पूछा।
चट्टान के पास अर्जुन को दरार में फँसा हुआ एक छोटा-सा लकड़ी का डिब्बा मिला। उस पर एक ऐसा ताला लगा था जिसके चक्के पर अंकों की जगह अक्षर थे। लकड़ी पर एक पहेली खुदी थी: ‘धूप से बनता हूँ, पर मेरी जड़ें नहीं। पानी पर नाचता हूँ, पर मैं कोई नर्तक नहीं।’ अर्जुन ने ठुड्डी पर उँगली टिका ली। यह क्या हो सकता है?


