कबीर और लालटेन की रोशनी वाली मन्नत
आयु 6–8
चंद्र नववर्ष की पूर्व संध्या पर कबीर अपने हाथ से लाल लालटेन बनाने निकलता है, ताकि वह सौभाग्य को घर तक पहुँचा सके, लेकिन रास्ते में उसे पता चलता है कि अपना सामान दोस्तों के साथ बाँटने से रोशनी और भी तेज़ चमकती है।

सर्दी की ठंडी हवा चल रही थी और गाँव नए साल के लिए जाग रहा था। कबीर ने अपना झोला खोला तो उसमें एक खास तोहफ़ा मिला: लाल रंग का एक सपाट काग़ज़ और सुनहरा ब्रश। “आज,” उसने पिप्पू से धीरे से कहा, “मैं एक ऐसी लालटेन बनाऊँगा जो सबके लिए जगमगाएगी।”
कबीर पत्थर के फ़व्वारे के पास बैठकर काग़ज़ मोड़ने लगा। यह आसान नहीं था! कोने नुकीले होने चाहिए थे और किनारे सीधे। पिप्पू ध्यान से देख रहा था, उसकी नाक फड़क रही थी। “यह एक राज़ की मुहिम है,” कबीर ने उससे कहा। “पूरे गाँव के लिए रोशनी!”
तभी चिंकी गिलहरी फुदकती हुई नीचे आई, वह उदास लग रही थी। उसके पास अपना सर्दियों वाला घोंसला बाँधने के लिए कोई फ़ीता नहीं था। कबीर ने अपने लाल रेशमी फ़ीते को देखा। वह लालटेन की डंडी के लिए था, पर चिंकी बहुत ठिठुरती हुई लग रही थी। “लो,” कबीर ने कहा, “यह तुम अपने घर के लिए ले लो।”


